पारसी वंशावली को लिखने व संरक्षित रखने के लिए गुजरात में कुलवृक्ष की मुहीम - KULVRIKSH PARSI VANSHAVALI - | KULVRIKSH VANSHAVALI | - | KULVRIKSH GENEALOGY |
भारत में पारसी वंशावली (पारिवारिक इतिहास) को लिखने व संरक्षित रखने के लिए गुजरात में कुलवृक्ष की मुहीम
पारसी समुदाय के संरक्षण के लिए जरूरी है कि वह अपने पारिवारिक इतिहास को जाने और उनकी वंशावली बढ़े। इसके लिए कुलवृक्ष जुट गया हैं।
पारसी आबादी भारत के सबसे छोटे समुदायों में से एक है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अब केवल 57264 पारसी ही जीवित बचे हैं, जबकि वर्ष 2001 में 69601 और 1940 में 114000 सदस्य इस समुदाय में थे। पारसी समुदाय के संरक्षण के लिए जरूरी है कि वह अपने पारिवारिक इतिहास को जाने और उनकी वंशावली बढ़े। इसके लिए कुलवृक्ष जुट गया हैं।
इतिहास के पन्नो में जाकर देखे तो मुस्लिम आक्रमण के कारण पारसी1200 साल पहले ईरान से भारत आए थे। इस समुदाय ने गुजरात के संजान में आसरा लिया। लेकिन उनकी आबादी व प्रजनन क्षमता में निरंतर कमी आ रही है। समगोत्र विवाह के कारण जहां इनकी सेहत लगातार खराब हो रही है वहीं प्रजनन क्षमता में भी कमी आ रही है। शोध के अनुसार 30 से 40 फीसद पुरुष इंफर्टीलिटी के शिकार हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि ऐसा ही रहा तो अगले 100-150 साल में इस समुदाय का नामोनिशां नहीं रह जाएगा।
पारसी माइग्रेट होकर भारत आए थे उनमें ज्यादातर पुरुष थे। पारसी पुरुषों ने स्थानीय महिलाओं से शादी की जबकि पारसी महिलाओं की समुदाय में ही शादी हुई।
भारत की पारसी आबादी पर उनके मूल और आनुवांशिक समानता को समझने के लिए इससे पहले कोई व्यापक अध्ययन नहीं किया गया है।
लेकिन अब भारत में पारसी वंश (वंशावली) के लिए गुजरात में कुलवृक्ष ने मुहीम शुरू कर दी है। सभी पारसी परिवारों से अनुरोध है की कुलवृक्ष की इस मुहीम में सहयोग दे। तोअभी लॉगिन करे www.kulvriksh.org पर या अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे
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